भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था और मजदूरों का हनन
१५ अगस्त१९४७ को भारत आजाद हुआ लेकिन सिर्फ़ आजाद हुआ गुलामी शायद पहले अच्छी थी , न्याय तो मिल जाता था आज न्याय के लिये उम्मीद करना गरीब लोगो को जहर पीने बराबर है , एक मामूली से केस मे १५ से २० वर्ष लग जाते है , सरकारें बदल जाती है , जज बदल जाते है बदहाल फटेहाल एक गरीब किसान , एक मिल का मजदूर अपनी बरसो की खून पसीने की कमाई अधिवक्ता साहेब और सफर मे खपा देता है , और आखिर मे उसे क्या मिलता है समझौते का एक पत्र , जिसे वो ना चाहते हुए भी लेना पडता है , पैसे वालो और सरकार के खिलाफ बोलना भारत मे देशद्रोह है , यहाँ की लोकतान्त्रिक व्यवस्था ही ऐसी है ! कानून की देवी अन्धी है , जो धातु की बनी है , उसे न कुछ सुनाई देता और न ही कुछ दिखाई देता और उसके पीछे बैठे विद्वान हमारे गुनाहों को झूठ से सच और सच से झूठ मे बदलने कि प्रक्रिया में प्रखर होते है , इन विद्वानों को एक छोटी सी बात समझने के लिये दशकों का समय लग जाता है , उसके बाद भी न्याय की आशा करना गरीब और मजदूरों को मेरे ख्याल से नहीं करना चाहिए ऐसे बहुत से उदाहरण है जब गरीब मजदूर प्रार्थी ही अपने हक की लड़ाई लड़ते लड़ते बाद मे गुन्हेगार साबित कर दिया गया और पैसे वाला गुन्हेगार होते हुए भी बाइज्जत बरी हो गया , मन ऊब जाता है ,
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